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Nadiyon me badhta pradushan BY PAWAN

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  • Source: http://desip.igc.org/populationmaps.html accessed November 2008
  • जल संकट Every item that we use needs water for production Domestic bathing, flushing, washing, cooking, drinking… Agriculture People require food to eat Industry Increase demand for goods Increase in Population Power water evaporation from reservoirs of large hydro power projects प्रत्येक वस्तु जिसका हम इस्तेमाल करते हैं उसके उत्पादन के लिये पानी की आवश्यकता होती है जल संकट के कारण घरेलू विस्तृत कृषि जल का व्यापक उपयोग उद्योग जनसंख्या में वृद्धि जल संकट!!!! ऊर्जा कृषि लोगों को खाने के लिये भोजन की आवश्यकता वस्तुओं की बढ़ती माँग नहाना, मल बहाना, धोना, भोजन पकाना, पीना....
  • 8 0 8 1271 208 1063 222 0 222 1363 135 1228 272 91 181 2700 1927 773 1709 701 1008 20 0 20 330 303 27 13 3 10 1036 387 649
  • Source: http://maps.grida.no/go/graphic/global_fertilizer_consumption, cartographer: Philippe Rekacewicz, UNEP/GRID-Arendal Source: http://www.earthpolicy.org/Updates/2008/Update72_data.htm#fig11
  • Source: http://www.unep.org/geo2000/pacha/fresh/fresh.htm
  • कृषि, वनों की कटाई और मच्छरों की रोक-थाम के उपायों के लिये तटीय पारिस्थितिकीय तंत्रों से जल का दोहन जहाजों के आवागमन और बाढ़ से सुरक्षा के लिये प्रवाह मार्ग का निर्माण और गहरीकरण ठोस अपशिष्ट का निपटारा, सड़कों का निर्माण और व्यवसायिक, औद्योगिक या रिहाइशी स्थलों का निर्माण जल क्षेत्रों का जलीय फसलों की पैदावार के लिये उपयोग बाढ़ तथा तूफान के नियंत्रण, जल प्रदाय तथा सिंचाई के लिये जल निकास मार्गों का (डाईक्स), बाँधों का तथा समुद्री दीवारों का निर्माण कीटनाशकों, वनस्पतिनाशकों, घरेलू तथा औद्योगिक अपशिष्ट का विसर्जन, कृषि का अतिरिक्त बहाव तथा गाद का भराव पीट, कोयले, बजरी, फॉस्फेट आदि के लिये आद्र भूमि का उत्खनन पेड़ों की कटाई और झूम (शिफ्टिंग) खेती आग बाँधों, गहरे निकास मार्गों तथा अन्य ढाँचों में गाद भरना नहरों, सड़कों तथा अन्य संरचनाओं द्वारा जलीय स्रोतों में परिवर्तन भूजल, तेल, गैस तथा अन्य खनिजों के निकालने के कारण तटों का धसकना
  • * एंथ्रोपोजेनिक - मनुष्य द्वारा निर्मित/ मनुष्यों के कारण निर्मित * * समय के साथ जनसंख्या में वृद्धि होती जाती है * जल संकट का मुख्य कारण है बढ़ती जनसंख्या 1940 और 1990 के वर्षों के बीच संसार की जनसंख्या दो गुनी से भी ज़्यादा, 2.3 अरब से 5.3 अरब लोगों तक हो गई। इस अवधि के दौरान ताज़े पानी का उपयोग चार गुना बढ़ा। वर्ष 2005 और 2050 के बीच, अनुमान है कि संसार की जनसंख्या में 2.7 अरब लोगों की वृद्धि होगी। परंतु पानी की पहले जैसी खपत को आबादी के अनुपात में बढ़ाने के लिये आवश्यक ताज़ा पानी संसार में है ही नहीं। बढ़ती आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये, कृषि उत्पादन बढ़ाना पड़ता है। सूखे महीनों में भी ज़्यादा ज़मीनों पर खेती करनी पड़ती है और खाद्य उत्पादन बढ़ाना पड़ता है। इसके लिये अधिक सिंचाई की भी ज़रूरत पड़ती है। बढ़ती आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये औद्योगिक गतिविधि और कच्चे माल के उत्खनन में भी वृद्धि होती है। बढ़ता औद्योगिकीकरण भी भारत जैसे विकासशील देश में आर्थिक विकास के लिये एक आधार है। उद्योग पानी के महत्वपूर्ण उपभोक्ता हैं। नहाने, कपड़े धोने जैसी घरेलू गतिविधियों में भी पानी अधिक ख़र्च होता है क्योंकि अब लोग ज़्यादा होते हैं जिन्हें इन सब गतिविधियों के लिये पानी की ज़रूरत होती है। इसके अलावा शहरीकरण में भी बढोत्तरी होती है। शहरी जीवन शैलियों में ज़्यादा पानी का उपयोग होता है। भारतीय मानदंडों के अनुसार भारतीय गाँवों में रहने वाले व्यक्ति को प्रतिदिन 40 लीटर पानी की आपूर्ति की जानी चाहिये लेकिन भारतीय शहर में रहने वाले व्यक्ति को शहर की श्रेणी पर निर्भर करते हुए प्रतिदिन 70 से 150 लीटर पानी की आपूर्ति की जानी चाहिये। कृषि, औद्योगिक गतिविधि और शहरीकरण सभी में वृद्धि के फलस्वरूप ऊर्जा की माँग भी बढ़ी है। इससे जल विद्युत पैदा करने वाली बहुउद्देश्यीय नदी घाटी परियोजनाओं की संख्या में बढोत्तरी हुई है। नदियों पर बाँध बनाये गये हैं और मॉनसून के दौरान एकत्रित किये गये पानी को बाँधा जाता है और विशाल जलाशयों में जमा किया जाता है ताकि पूरे वर्ष सिंचाई और ऊर्जा की माँगों को पूरा किया जा सके। ताज़े पानी के इन जलाशयों में से बहुत अधिक पानी भाप बन कर उड़ जाता है। भारत के विद्युत उत्पादन का 22% जल विद्युत से आता है। जीवाश्म ईंधन (कोयला, प्राकृतिक गैस, तेल आदि) से विद्युत उत्पादन की प्रक्रिया के लिये भी पानी की आवश्यकता होती है। अतः ऊर्जा की आवश्यकताओं में वृद्धि के साथ पानी की खपत बढ़ती है। जल संकट से ताज़े पानी के संसाधनों को दोहरी क्षति पहुँचती है :उनकी मात्रा को (जलवाही स्तर का अत्यधिक दोहन, सूखी नदियाँ इत्यादि), और गुणवत्ता को (यूट्रोफिकिशेन, जैविक पदार्थ का प्रदूषण, खारे पानी का आकर मिलना)। * *  जनसंख्या में वृद्धि के परिणामस्वरूप पानी की माँग भी बढ़ती है। घरों में इस्तेमाल होने वाला अधिकांश पानी निस्तार के गंदे पानी के रूप में बाहर निकलता है- काला पानी (गंदा निस्तार का पानी) और सिंक से निकलने वाला स्लेटी (धूसर) रंग का पानी, नहाने का निकला गंदा पानी, कपड़े धोने से निकला गंदा पानी आदि। गंदे पानी का उपचार करने के हमारे संयंत्र अपर्याप्त हैं। अतिरिक्त अनुपचारित गंदा पानी या तो सतही जल निकायों (झीलों, तालाबों, समुद्रों, नदियों, समुद्रों) में छोड़ दिया जाता है या फिर मिट्टी में डाल दिया जाता है। इससे सतह के जल और भूजल दोनों प्रदूषित हो जाते हैं।  गंदे पानी में रोगाणु होते हैं जो हैजा, मोतीझरा, पीलिया आदि जैसी बीमारियाँ पैदा कर सकते हैं। बर्तन और कपड़े धोने से निकले गंदे पानी में फॉस्फेट और अन्य रसायन होते हैं जो जैविक वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। इसके परिणामस्वरूप झीलों और तालाबों जैसे जल निकायों का यूट्रोफिकेशन हो जाता है जिसमें खर-पतवार की अत्यधिक वृद्धि से जल निकायों की सतह ढंक जाती है और उनके अंदर के सभी जीव-जंतु मर जाते हैं। मिट्टी में गंदे पानी की मात्रा बढ़ने से भूजल स्रोतों में नाइट्रेट की मात्रा अधिक हो सकती है। नाइट्रेट प्रदूषण से ब्लू बेबी सिंड्रोम जैसी खतरनाक बीमारियाँ हो सकती हैं। (कुछ निश्चित परिस्थितियों में ग्रहण किया नाइट्रेट नाइट्राइट में परिवर्तित हो जाता है, जो हीमोग्लोबिन से प्रतिक्रिया करता है और रक्त की ऑक्सीजन को ग्रहण करने की क्षमता को घटा देता है। जब गर्भवती महिलायें नाइट्रेट प्रदूषित पानी को पीती हैं, तो वह बच्चे को प्रभावित करता है और यदि उसके मस्तिष्क तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुँचती तो बच्चा मर भी सकता है) जनसंख्या में वृद्धि के फलस्वरूप कृषि, औद्योगीकरण और विद्युत उत्पादन (घरेलू, औद्योगिक और कृषि उपयोग के लिये) में भी वृद्धि होती है। ये साफ़ पानी की उपलब्धता को और घटाता है। जल संकट से ताज़े पानी के संसाधनों को दोहरी क्षति पहुँचती है :उनकी मात्रा को (जलवाही स्तर का अत्यधिक दोहन, सूखी नदियाँ इत्यादि), और गुणवत्ता को (यूट्रोफिकिशेन, जैविक पदार्थ का प्रदूषण, खारे पानी का आकर मिलना)। * ये आंकड़े भारत के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले गंदे पानी की मात्रा (दस लाख लीटर प्रतिदिन में) दर्शाती हैं। यह तालिका यह भी दर्शाती है कि इस गंदे पानी में से कितने का उपचार होता है और कितने अनुपचारित गंदे पानी को हमारे ताज़े पानी की धाराओं और मिट्टी में छोड़ दिया जाता है। इस सूची में अपने राज्य / केंद्र शासित प्रदेश के प्रदर्शन की अलग अपने-आप में और तुलनात्मक रूप से जाँच करें। * ये स्लाइडें भारत के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले गंदे पानी की मात्रा (दस लाख लीटर प्रतिदिन में) को दर्शाती हैं। यह तालिका यह भी दर्शाती है कि इस गंदे पानी में से कितने का उपचार होता है और कितने अनुपचारित गंदे पानी को हमारे ताज़े पानी की धाराओं और मिट्टी में छोड़ दिया जाता है। इस सूची में अपने राज्य / केंद्र शासित प्रदेश के प्रदर्शन की अलग अपने-आप में और तुलनात्मक रूप से जाँच करें। * ये स्लाइडें भारत के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले गंदे पानी की मात्रा (दस लाख लीटर प्रतिदिन में) को दर्शाती हैं। यह तालिका यह भी दर्शाती है कि इस गंदे पानी में से कितने का उपचार होता है और कितने अनुपचारित गंदे पानी को हमारे ताज़े पानी की धाराओं और मिट्टी में छोड़ दिया जाता है। इस सूची में अपने राज्य / केंद्र शासित प्रदेश के प्रदर्शन की अलग अपने-आप में और तुलनात्मक रूप से जाँच करें। * अधिक लोगों को अधिक भोजन की आवश्यकता होती है। अरबों लोगों की बढ़ रही आबादी का पेट भरने के लिये वनों को काटा जा रहा है और उन्हें खेती की भूमि में परिवर्तित किया जा रहा है। * जल प्रबंधन में वन मुख्य भूमिका निभाते हैं। पानी के संरक्षण और पुनर्भरण को सुगम बनाने के अलावा वे ऊपर की उपजाऊ मिट्टी को बारिश में बह जाने से भी रोकते हैं। जब यह मिट्टी बह कर जल निकायों में चली जाती है और तब वह तालाबों, नदियों और झीलों को पाट देती है। * कृषि का केवल पैमाना ही नहीं बदल रहा है, खेती करने का हमारा तरीका भी बदल रहा है। प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ाने के लिये उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ा है। उपज को बढ़ाने के लिए कीटनाशक का भी अधिक इस्तेमाल होता है। उर्वरक और कीटनाशक आसानी से पानी में घुल जाते हैं। वे सतही जल स्रोतों में सिंचाई के बहते पानी और बारिश के बहते हुए पानी के ज़रिये मिल जाते हैं और ज़मीन में रिस कर भूजल के स्रोतों कोभी प्रदूषित कर देते हैं।   सामान्य तौर पर भारत में नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का उपयोग होता है। नाइट्रोजन नाइट्रेट में परिवर्तित हो जाती है। अतिरिक्त नाइट्रेट जो फसल द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, वह रिस कर मिट्टी और भूजल में मिल जाता है। पानी में नाइट्रेट प्रदूषण ब्लू बेबी सिंड्रोम पैदा कर सकता है।   हमारी फसलों को नाशक कीटों और जंतुओं से बचाने के लिये और स्वयं को बीमारियों से बचाने के लिये हमने कीटनाशकों, वनस्पतिनाशकों और फंफूदनाशकों का आविष्कार किया। इससे फसल की उपज में बढोत्तरी हुई और मच्छर जैसे नाशक कीटों का नाश हुआ। कीटनाशक उद्योग बढ़ते-बढ़ते अरबों-खरबों का उद्योग बन गया। फिर हमें विभिन्न प्रकार के कैंसर, जन्मजात कमियाँ और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें दिखाई देने लगीं। संसार भर में अध्ययनों ने कीट नाशकों को इसके लिये दोषी बताया। कीट नाशकों में जटिल कार्बनिक क्लोराईड यौगिक और अन्य भारी धातुयें होती हैं जो शरीर में इकट्ठी होती जाती हैं (जैव संचयन) और खाद्य श्रृंखला में आगे बढ़ते हुये उसका स्तर भी बढ़ता जाता है। और ज़्यादा समय तक ऐसा होने पर हमारे शरीर में उनकी मात्रा बढ़ कर सुरक्षित स्तर से पार हो जाती है और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्यायें पैदा कर देती है जिनमें से अधिकांश जानलेवा होती हैं। भारत में कृषि सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है और उसमें कीटनाशकों का उपयोग व्यापक तौर पर होता है। सारे संसार में कीटनाशकों का उत्पादन घट रहा है लेकिन भारत में वह अब भी बढ़ रहा है। विश्व के अन्य हिस्सों में जिन कीटनाशकों पर प्रतिबंध है, उनका इस्तेमाल हम अब भी कर रहे हैं। अप्रशिक्षित किसान कीटनाशकों का आवश्यकता से अधिक उपयोग करते हैं और कीटनाशकों के इस्तेमाल और रख-रखाव के दुष्परिणामों के बारे में लापरवाह होते हैं। आज कीटनाशक हमारे भूजल के लिये सबसे बड़ा रासायनिक खतरा माने जाते हैं।   हम अपने घरों में भी कुछ कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं—क्या आप किसी एक कीटनाशक का नाम बता सकते हैं? (कीटनाशक छिड़काव) * बढ़ रही जनसंख्या पशुओं के उत्पादों, जैसे माँस, दुग्ध उत्पाद, मुर्गी उत्पाद आदि, की अधिक माँग कर रही है। पशुओं के प्रजनन में वृद्धि से संसाधनों में तेज़ी से कमी आई है- पशुओं के लिये अधिक पानी और भोजन की आवश्यकता होती है। पशु पालन में वृद्धि से अत्यधिक चराई होती है, जिससे बारिश के दौरान ऊपर की उपजाऊ मिट्टी बह कर ताज़े पानी के संसाधनों में मिल जाती है। माँस, दुग्ध और मुर्गी उद्योग जल का अतिशय उपयोग करने वाले उद्योग हैं और इनसे निकलने वाले गंदे पानी में कॉर्बनिक अपशिष्ट की प्रचुर मात्रा होती है। अनुपचारित गंदे पानी में रोगाणु होते हैं जो बीमारियाँ उत्पन्न कर सकते हैं और मीठे पानी के स्रोतों का यूट्रोफिकेशन भी उत्पन्न कर सकते हैं। * कपड़ों की रंगाई और रंग निकालने की प्रक्रिया में भी ढेर सारा गंदा पानी निकलता है जिसमें हानिकारक रसायन और भारी धातुयें होती हैं। अधिकांश मामलों में इस गंदे पानी का पर्याप्त रूप से उपचार नहीं किया जाता और इसे नगरीय निस्तार तंत्र या भूजल के जल स्रोतों में या भूमिगत जलाशयों में विसर्जित कर दिया जाता है। ऐसे मामलों के उपलब्ध अध्ययन - गुजरात का चौकी क्षेत्र, तमिलनाडु का तिरुपुर। कागज उद्योग सबसे अधिक प्रदूषण करने वाले उद्योगों ( वायु और जल प्रदूषण) में से एक है। जैसे-जैसे हम और अधिक कागज का इस्तेमाल करते हैं, माँग बढ़ती है और बढ़ती माँग को पूरा करने के लिये आपूर्ति भी बढ़ती है। हालाँकि कागज का उत्पादन अत्यधिक प्रदूषण करने वाला एक उद्योग है लेकिन मुख्य हानि छोटे पैमाने की इकाइयों द्वारा की जाती हैं जो अपने बहिर्प्रवाह का ठीक तरीक से उपचार नहीं कर पाते और बढ़ती माँगों को पूरा करने के लिये छोटे पैमाने वाली और अधिक इकाइयाँ फैलना शुरू हो जाती हैं। चमड़े के जूतों, बैग और अन्य सहायक वस्तुओं को बनाने के लिये पशुओं की कच्ची खाल को न सड़ने वाले मज़बूत चमड़े में परिवर्तित किया जाता है। इसके लिये बहुत सारे पानी और खतरनाक रसायनों जैसे हैग्ज़ावेलेंट क्रोमियम की ज़रूरत होती है। काफ़ी मात्रा में विषैला बहिर्प्रवाह उत्पन्न होता है जिसे जल निकायों या खेतों में छोड़ दिया जाता है। लघु उद्योगों में चमड़ा उद्योग सबसे खराब प्रदूषक है। कैडमियम एक भारी धातु है जिसका उपयोग बैट्रियाँ बनाने के लिये होता है और इस उद्योग से निकलने वाले कैडमियम की प्रचुर मात्रा वाला बहिर्प्रवाह हमारे ताज़े पानी के जल स्रोतों को प्रदूषित कर रहा है। कैडमियम की ज़रूरत से ज्यादा मात्रा वाले पानी को लंबे समय तक पीने से गुर्दे काम करना बंद कर सकते हैं और फेफड़े खराब हो सकते हैं। धातुओं को बदरंग होने से बचाने के लिये उन्हें या तो इलैक्ट्रोप्लेटेड किया जाता है या उन्हें रंगा जाता है। आपकी घड़ी का पीछे का खोल या स्वयं घड़ी का डायल, आपका ज्योमितीय बॉक्स, घर का रेफ्रिजिरेटर- धातुई वस्तुओं के हमारे कई उपयोग हैं। कुछ धातु की वस्तुओं की सूची बनायें जिनका उपयोग आप रोज़मर्रा के जीवन में करते हैं। क्या उन्हें रंगा गया है या इलैक्ट्रोप्लेटेड किया गया है? दोनों ही प्रक्रियाओं में बड़ी मात्रा में बहिर्प्रवाह निकलते हैं जिनमें खतरनाक भारी धातुयें होती हैं। जो उद्योग विशिष्ट तौर पर यह कार्य करते हैं, वे लघु उद्योग हैं और उनके पास बहिर्प्रवाह उपचार संयंत्रों को बनाने के लिये पर्याप्त संसाधन नहीं होते। इसलिये वे गंदे पानी वाले बहिर्प्रवाह को ऐसे ही नालियों, सतही जल निकायों या मिट्टी में छोड़ देते हैं। उत्पादों की बढ़ रही माँगों के साथ औद्योगीकरण भी बढ़ता है। कानून के अनुसार उद्योगों के लिये यह आवश्यक है कि वे अपने बहिर्प्रवाह को हमारे जल स्रोतों में छोड़ने से पहले उसका पर्याप्त रूप से उपचार करें। बड़े उद्योगों के पास ऐसा करने के लिये पैसा और ज़मीन होते हैं और उनकी आसानी से निगरानी भी की जा सकती है। लेकिन समस्या लघु उद्योगों और बहुत ही छोटे उद्योगों के साथ है जिनके पास बहिर्प्रवाह उपचार संयंत्रों में लगाने के लिये पैसा नहीं है और जो इतने असंख्य और फैले हुए हैं- रिहाइशी इलाक़ों में भी, कि उनकी निगरानी करना इतना आसान काम नहीं है। बढ़ती औद्योगीकरण की जड़ है मनुष्य, इसलिये हम सिर्फ़ उद्योगों पर उंगुली नहीं उठा सकते और उन्हें अपनी प्रदूषण की समस्याओं के लिये दोषी नहीं ठहरा सकते। यह हमारी बढ़ती माँगें हैं जिन्हें पूरा करने में उद्योग लगे हुए हैं। क्या हम सकारात्मक रूप से मदद करने के लिये आज अपनी जीवन शैली में परिवर्तन कर सकते हैं? वे आज के बच्चे ही हैं जो कल के नेता होंगे। उस आयु में यह ज़रूरी है कि ज़िम्मेदार निर्णय लिये जायें- ऐसे निर्णय जो केवल तात्कालिक लाभों का न देखें बल्कि सभी दृष्टियों से दूरगामी लाभों को देख कर लिये जायें। * जब उत्पादों के लिये माँग बढ़ती है तो इससे पहले कि हम उनका निर्माण शुरू करें, हमें कच्चे माल की आवश्यकता होती है। अधिकांश कच्चे पदार्थों का पृथ्वी से उत्खनन होता है। अयस्क की एक बड़ी मात्रा का निष्कर्षण और परिष्करण होता है तब जाकर हमें हमारी ज़रूरत का खनिज छोटी मात्रा में प्राप्त होता है। उत्खनन की प्रक्रिया में अयस्क में से विषैले पदार्थों जैसे साइनाइड और सल्फ्यूरिक अम्ल को धोकर निकाल दिया जाता है और आवश्यक पदार्थ (खनिज) को अलग कर लिया जाता है। इस प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट की मात्रा भी बहुत अधिक होती है और जहरीले पदार्थ वाले इस अपशिष्ट का ढेर लगा दिया जाता है। खदानों की धूल से बह कर गुजरने वाले और खदानों के अपशिष्ट के ढेरों पर गिरने वाले बारिश के पानी में विषैले पदार्थ मिल जाते हैं जो जल निकायों में जमा हो जाते हैं या रिस कर भूमिगत जलाशयों में चले जाते हैं। * अधिक लोगों के होने से अधिक खपत और अधिक अपशिष्ट उत्पादन (औद्योगिक और घरेलू) होता है। घरेलू ठोस कचरे पर ध्यान केंद्रित करें तो ज़्यादा लोग ज़्यादा ठोस कचरे को उत्पन्न कर रहे हैं। उसी के साथ, हमारी जीवन शैली में परिवर्तन के कारण प्रत्येक व्यक्ति द्वारा उत्पन्न कचरा भी बढ़ रहा है। इसके अतिरिक्त हमारे प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के प्रति हमारे बुजुर्गों में जो संवेदना और कचरे को हर जगह या हर कहीं न फेंकने की जो संस्कृति थी वह तेज़ी से विलुप्त हो रही है। * हमने भारत में गंदे पानी के उपचार की सुविधाओं की दुखद स्थिति के बारे में चर्चा की है। कई जगहों में अनुपचारित गंदे पानी को ताज़े पानी के स्रोतों में छोड़ दिया जाता है। ठोस अपशिष्ट को कचरे के खुले मैदानों में पटक दिया जाता है। जब बारिश होती है, तो बारिश का पानी इन कचरे के ढेरों से होकर बहता है और कचरे में उपस्थित विभिन्न रसायनों को सोख लेता है। बारिश का यह पानी बह कर या तो सतही जल निकाय में मिल जाता है या ज़मीन में रिस कर भूजल में मिल जाता है। और उसमें घुले हुये रसायनों द्वारा जल स्रोत प्रदूषित हो जाते हैं। देश में लगभग हर जगह, कचरे को अंधाधुंध रूप से जलाया जाता है। प्लास्टिक, रबर और अन्य पदार्थों के जलने से ज़हरीली गैसें निकलती हैं। इनमें से कुछ गैसें बारिश के पानी में घुल जाती हैं और सतही और भूमिगत स्रोतों को प्रदूषित कर देती हैं। * अधिक से अधिक लोग शहरों की ओर आ रहे हैं। शहरों में लोगों की घनी बस्तियाँ होती हैं। लेकिन अधिकांश शहर बढ़ती जनसंख्या के बोझ को नहीं उठा सकते और कई स्थानों पर नगरीय सेवायें अपर्याप्त हैं। नगरीय सेवायें जैसे जल आपूर्ति, गंदे पानी का उपचार और अपशिष्ट प्रबंधन। शहरों और कस्बों में गंदे पानी और अपशिष्ट के विसर्जन और कचरे को जलाने से संबंधित समस्यायें बढ़ गई हैं। शहरों में वाहनों के यातायात में और लघु उद्योगों में भी वृद्धि हुई है। इनसे निकलने वाले वायु प्रदूषक बारिश के पानी में घुल जाते हैं और हमारे जल स्रोतों में मिल जाते हैं। शहरों और कस्बों में ज़मीन की बहुत माँग है। कई शहरों में न सिर्फ़ खाली ज़मीन का सीमेंट और पत्थरों से पाटा जाना बढ़ा है बल्कि प्राकृतिक जल निकायों, जैसे तालाब और झीलों, को भी पूर दिया जाता है और इनकी जमीनों का इमारतों तथा सड़कों के निर्माण के लिये उपयोग किया जाता है। इसलिये भूजल के संसाधनों का प्राकृतिक रूप से पुनर्भरण बेहद कम हुआ है (खुली जमीनों और जल स्रोतों जैसे तालाब और झीलों के जरिये प्राकृतिक रूप से पुनर्भरण नहीं हो पाता)। साथ ही साथ शहरों में भूजल का अत्यधिक दोहन होता है क्योंकि इसके बिना नगरपालिकायें लगातार बढ़ती हुई आबादी का दबाव नहीं संभाल नहीं सकतीं और उनके लिये पर्याप्त जल की आपूर्ति नहीं कर सकतीं। जब भूमिगत जलाशयों में जल की मात्रा घट जाती है ( अत्यधिक दोहन और घटते पुनर्भरण के कारण), तो पानी में कुछ विशेष खनिजों का अनुपात (क्षेत्र की मिट्टी की बनक और पत्थरों पर निर्भर करते हुए) बढ़ जाता है और यह मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल सकता है। * * गणेश चतुर्थी या दुर्गा पूजा के दौरान गणेश, दुर्गा आदि की मूर्तियाँ बनाने के लिये जिन रंगों का इस्तेमाल किया जाता है उनमें कई विषैले तत्व जैसे आर्सेनिक, पारा आदि होते हैं। जब मूर्तियों को जल निकायों में विसर्जित किया जाता है तो जल की गुणवत्ता पर दुष्प्रभाव पर पड़ता है और इन जल निकायों में भारी धातुओं की सांद्रता बढ़ जाती है। भारी धातुयें हमारे शरीर में संचित होती हैं और लंबे समय में प्राणघातक हो सकती हैं। * * * * प्राकृतिक आवासों के भौतिक परिवर्तनों और विनाश को अब तटीय क्षेत्रों के लिये सबसे महत्वपूर्ण खतरों में से एक माना जाता है। पिछली सदी में मुख्य रूप से त्वरित सामाजिक और आर्थिक विकास तथा खराब नियोजन के चलते मनुष्यों द्वारा किये गये भौतिक परिवर्तनों के कारण संसार की आधी आद्र भूमि, और इससे भी ज्यादा मात्रा में उसके मैनग्रोव जंगल लुप्त हो गये हैं (यूएनईपी 2002)। तटवर्ती शहरी इलाकों में लगभग एक अरब लोग रह रहे हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि संसार के लगभग 50 प्रतिशत तट विकास से संबंधित गतिविधियों के कारण खतरे में हैं। तटीय पारिस्थितिकीय तंत्रों पर गहरे दबाव को देखते हुये सभी स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तरों पर उनके क्षय की रोकथाम और उनकी सुरक्षा के उपायों की आवश्यकता है। स्रोत: वाइटल वॉटर ग्राफिक्स * इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि सबसे अधिक घनी आबादी वाले तटवर्ती इलाके ही वे इलाके भी हैं जहाँ सबसे अधिक तटीय क्षय हुआ है। ब्लैक सी के चारों ओर के क्षेत्र, भूमध्यसागरीय और दक्षिण एशिया में तटीय ज़मीन का सबसे अधिक हिस्सा परिवर्तित कर दिया गया है, जबकि आर्कटिक, उत्तरपूर्वी प्रशांत, दक्षिण प्रशांत, पश्चिम और मध्य अफ्रीका, पूर्वी अफ्रीका, रेड सी/गल्फ ऑफ ईडन और कुवैत के तटवर्ती क्षेत्रों में ज़मीन के हिस्से को सबसे कम परिवर्तित किया गया है। स्रोत: वाइटल वॉटर ग्राफिक्स
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